मध्यकालीन भारतीय सन्त एवं उनका योगदान
नीरजा नामदेव
इतिहास विभाग, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय,रायपुर
मध्य युग भारतीय संस्कृति की जीवन शक्ति का परीक्षाकाल रहा है। यह वह युग है जब छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त भारत न केवल राजनैतिक दृष्टि से ही अपना महत्च खो बैठा था, अपितु सामाजिक धार्मिक एवं आर्थिक सभी दृष्टियों से आभाहीन-सा प्रतीत होता था। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह देश के सांस्कृतिक पराभव का युग था। राजनैतिक क्षेत्र में विदेशी आक्रमणकारियों के सतत् घातक प्रहारों ने न केवल भारतीय राजाओं की शक्ति को ही क्षीण कर दिया था। अपितु त्रस्त जन सामान्य को भी यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया था उनके स्वामी जब अपनी ही रक्षा करने में असमर्थ है तो उनकी रक्षा क्या कर सकेगें, इतना ही नही, ये विदेशी अक्रान्ता न केवल यहां से द्रव्य ही लूट कर ले जाते थे, अपितु धीरे-धीरे इन्होने यहां अधिपात्य जमाना भी आरंभ कर दिया था जो कलान्तर मे दृढ़ हो गया था।
मध्यकालीन, भारतीय सन्त
इतिहास पर्यावरण और व्यक्तित्व दो महान बलों का प्रतिफल है। इतिहास में घटित सभी महत्वपूर्ण घटनाएं आस-पास की सभी भौगोलिक परिस्थतियों, राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास से प्रभावित होने पर घटित होती है। रिचर्ड हेकल्चर ने इतिहास के संबंध में ठीक ही कहा है कि भूगोल और क्रोनोलाॅजी (वंशानुक्रमशास्त्र) उसके सूर्य और शशि है अथवा दाहिनी और बांयी आंख है।
विशेष रूप से भारत के इतिहास के संदर्भ में कहा जा सकता है कि उसे भौतिक परिस्थितियों के सापेक्ष गहन अध्ययन से ही समझा जा सकता है। भारतीय उपमहाद्वीप हिमालय से सागर तक विस्तृत है जिसे भारत के नाम से जाना जाता है, जो पौराणिक परंपरा में भरत नामक सम्राट की कर्मभूमि होने के कारण उसी के नाम से विख्यात हुआ। इस राजनैतिक दौर्बल्य तथा धार्मिक अनास्था ने सामाजिक चेतना को भी विकृत कर दिया था। ब्रम्हवादी समाज-व्यवस्था में समाज की विशाल जनसख्या को अन्त्यज या शूद्र कह कर उपेक्षित कर डाला था। ये शूद्र कहे जाने वाले मनुष्य दो प्रकार के कष्टो को भोग रहे थे। एक कष्ट उनका यह था कि उनसे उनके ही देशवासी घृणा करते थे, ब्रम्हा्रण, वैश्य आदि वर्णों के द्वारा उनके न केवल घोर उपेक्षा होती थी वरन् उनको अस्पृश्य भी समझा जाता था। समाज की अर्थव्यवस्था में इनका कोई अधिकार ही न था। सवर्गों की कृपा पर इनकी अजीविका चलती थी। दूसरी और विदेशी आक्रमणकारियों का संत्रास भी इनको भोगना पड़ता था। इस प्रकार इन शूद्रो का जीवन ऐसा नरकीय हो गया था कि उसमें जीवन को जीने के लिये स्वास्थ्य तथा प्राथमिक परिस्थितियों तक अभाव हो गया था।तथा इस शूद्रों कह जाने वाले वर्ग की एक समस्या धार्मिक भी थी। भारतीय धर्म प्रारंभ स ही, ऐसी व्यवस्था के बीच उपजा और पनपा था, जो वर्ण और आश्रमों को विशेष महत्व देती थी। इस वर्ण व्यवस्था का आदीम आधार कर्मों के विभाजन के आधार पर समाज का संगठन था। कुछ समय बाद वर्णों का निश्चिय कर्म के स्थान पर जन्म से होने लगा यह सब ब्रम्हाणवादी युग में हुआ। समाज के नियमों और आचरण की संहिताओं का निर्धारण ब्रम्हाण करते थें, अतएव सम्पूर्ण समाज व्यवस्था ब्रम्हाणों के हितों की सुरक्षा का अधिकाधिक ध्यान रखती हुई शूद्रों की अधिकतम उपेक्षा, दरिद्रता और अधोगति की ओर फेकती गई। ऐसी राजनैतिक विश्रृंखलता, धार्मिक अनास्था, सामाजिक अव्यवस्था तथा आर्थिक दरिद्रता का युग में संत रैदास, गुरूनानक, कबीर, रामदास चैतन्य, नरसी मेहता संत पोवन्ना (कन्नड़), दादू तुकाराम, ज्ञानेश्वर, मीराबाई इत्यादि संतों का अभिर्भाव हुआ। जिन्होने भक्ति आन्दोलन के माध्यम से समाज को समता, एवं समरसता, समान्यता का उपदेश देकर अपने गीतो, भजनों, पदावलियों के गायन से अलोकित किया।हिन्दी संत काव्य का दिशा-निर्देशन, सर्वधन और विकास का श्रेय कबीर को ही है कबीर के पश्चात् संत मत का प्रसार नये-नये पंन्तो के रूप मे होता रहा इन पंथों में सिख पंथ, रैदासी पंथ, दादू पंथ, निरंजनी सम्प्रदाय, बाबरी पंथ, मूलक पंथ, चरण दास संम्प्रदाय, राम स्नेही सम्प्रदाय आदि उल्लेखनीय है समाज की धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं का संतो ने वैयाक्तिक जीवन के माध्यम से समाधान प्रस्तुत करने का प्रत्यन्न किया धार्मिक अवर्णों का उन्होने खुलकर विरोध किया। सामाजिक कुरूतियों को उन्होने कभी स्वीकार नही किया और यथा संभव उन पर भी उठारराघात किया।
राजनैतिक अत्याचारों से जूझते-जूझते उन्होने सिर तक कटा दिया पर उसे झुकने नही दिया। आर्थिक दरिद्रता से अपने को उभारने के लिए कोई कपड़ा बुनता रहा, तो कोई जूतियां ही गाँठता रहा, कुल मिलाकर समाज की किसी भी शक्ति की प्रहार से उन्होने अपने व्यक्तित्व को विघटित नही होने दिया यह उनकी सफलता का रहस्य है इसलिए वह संत-व्यक्तित्व की परम्परा मेें संत भावना की ज्योति को जीवित और जागृत रख सके। इस व्यक्तित्व के कारण उनकी जीवन और जाति के प्रति विशेष दृष्टि विकसित हुई। विश्व की चातुर्दिग समृद्धि और उसकी सामयी उनके जीवन यापन ने साधन से अधिक कोई स्थान न ग्रहण कर सकी। उनका लक्ष्य सदा ही इससे भिन्न रहा इसीलिए उनमें इष्र्या न हुई और उस साध्य के ओर बढ़ते हुए भी वे सब इकट्ठे ही रहें। अलौकि साध्य को स्वीकार करने के कारण उनके जीवन दर्शन में एकरूपता के साथ स्थायीव्त भी बना रहा। वस्तुत दर्शन में इस संता ने ही भावना की नीव को दृढ़ता और स्थिरता प्रदान की इसीलिए सब ने इसे भारतीय सांस्कृति पुनः जागरण का काल स्वीकार किया।
इस युग का समाज समान्तवादी प्रद्धति पर संगठित था जिसमें सुल्तान प्रधान स्वेक्षाचारी होता था। उसके नीचे शासकीय सामन्त होते थे उच्च पदस्थ सेना अधिकारी होते थे जिनके विशिष्ट अधिकार एवं अनेकों सुविधाएं मिली थी। इन अमीर उमराओं एवं राजन्य वर्ग का जीवन सर्वसाधारण जीवन से सर्वथा भिन्न स्वाच्छद भोग योजक विलास का बोझ जर्जर निमन वर्ग पर पड़ता था और वह यह वर्ग इसे अपने पूर्व जन्म के कामों का फल मानकर सहे जा रहा था। मुस्लिम हिन्दू राजाओं की चक्की के दो पाटों के बीच यह दायनीय निम्न वर्ग पिसा जा रहा था इस युग में प्रधान न्यायाधीश जो सद्रे जहां भी कहलाता था काजी की उपाधि से विभूषित सभी मसलों का फैसला करता था। मुती कानून की व्यवस्था करने वाला एक उच्च पदाधिकारी कहलाता था। इन सबका व्यवहार अन्य लोगों के साथ अभद्र एवं असभ्यता पूर्ण होता था ये लोग आचरण भ्रष्ट होते थे दुराचारी एवं विलासी जीवन व्यतीत करना इनका लक्ष्य सा हो गया था पर्दे के प्रथा, बाल विवाह, बहू विवाह, गुलाम प्रथा तथा अन्य सामाजिक कुरूतियों का प्रचलन था यवन लोगो में स्चेक्षा चरिता अत्याचार अनाचार तथा क्रूर वृतियों का प्रबंध था। हिन्दू महिलाओं के साथ मुस्मिल युवकों की शादी जबरदस्ती करायी उजाती थी। लिखा है कि विजयनगर ने वीरता पूवर्क बदला लिया है राम को परास्त करके स्यवं अपने पुत्री का विवाह अपने हुसन खान के साथ कर दिया स्त्रियों की दशा दयनीय थी। नारी जाति का अपने स्वामिनों या अन्य पुरूष सम्बन्धियों पर आश्रित रहना इस युग के सामाजिक जीवन का प्रधान लक्षण था तथा दामपत्य जीवन के अन्तर्गत उसे दृढ़ पतिव्रत धर्म की अपेक्षा की जाती थी। इसके अतिरिक्त हिन्दुओं में समकालीन सामाजिक प्रथायें, बाल-विवाह, बालिका वध तथा दहेज आदि भी थी। बाल-विवाह के प्रचलन के कारण मुस्लिम सैनिकों तथा राज कर्मचारियों का अनैतिक आतंक माना जाता है। जौहर के समकालीन महत्व को प्रकाशित करते हुए ‘‘ने लिखा है कि उसके द्वारा वे विदेशी आततायियों की रूप-लम्पटता का शिकार न बनकर अपने गौरव की रक्षा करने के साथ ही अपनी ओर के सैनिकों को बलिदान की अमर पे्ररणा भी प्रदान करती थी। जाति-पाति तथा भेद-भाव के कारण समाज में अंधिविश्वास फैला हुआ था। मार्कोपोलो की दृष्टि से अंधिविश्वासी भी थे। फलित ज्योतषी, जादू टोना ओर शकुनों आदि शैतानी कलाओं में वे विश्वास करते थे। गुजरात के ब्राहा्रण पक्के मूर्तिपूजक थे। मुस्लिम शासकों के सतत् अत्याचारों और देवस्थानों के विनाश ने ईश्वर में अन्ध-श्रद्धा रखने वालों की आंखे खोल दी। हिन्दुओं का भ्रम दूर हो गया कि संकठ के समय भगवान की मूर्ति उनकी हजारों हाथों से रक्षा करेगी फिर हिन्दू समाज दो भागों में बांटा गया। कुछ लोग भूत, प्रेत, शाप, ताप तथा तंत्र विद्याय में शरण्एा लेने लगे और दूसरे अधिक प्रबुद्ध और चिन्तनशील लोग परिवर्तन की राह खोजने में संलग्न हो गये। इनमें प्रमुख स्तर संत कवियों का रहा, पैतृक सम्पदा में प्राप्त आर्थिक दरिद्रता और नैतिक समृद्धि संतों के जीवन का सबसे बड़ा आभूषण रहा है। उनके जीवन की कर्मण्चयता इस आर्थिक-दरिद्रता का ही वरदान है ओर आंतरिक गुणों के विकास के कारण प्रखर व्यक्तित्व इस नैतिक-समृद्धि की ही देन हैं। लौकिक एवं पारलौकिक जीवन में अद्भुत संतुलन और समन्वय स्थापित कर गौरवमय वैयक्तिक जीवन करने वाले संतों ने समय-समय पर समाज का पथ-पदर्शन कर युग नेता का रूप ग्रहण किया है। इन्होने जनता में आत्म-विश्वास जगाने के लिए हिन्दू संस्कृति के पुराने मूल्यों को नये शब्दों और नई संवेदना के साथ जनता के सामने रखा जहां कई बात कहानी थी, वहां नई बात कही। साथ-साथ ये सन्त विद्रोही स्तर उठाने में भी नही चूके इन्होने भारतीय धर्मों और दर्शनों के सूक्ष्म तत्वों को जनता के लिए सहज भाषा में प्रस्तुत किया और समाज की तत्कालीन परिस्थितियों के अपयुक्त नई विचारधारा और नए संदेश भी दिये उनके स्वर में विद्राही था, नये पुराने का सामंजस्य था और था एक विवेक। इसीलिए उन स्वरों का जनता ने स्वागत किया। समाज कल्याण को ही सन्तों ने अपने काव्य और जीवन का प्रमुख उद्देश्य स्वीकार किया था। कबीर, संत चरणदास जैसे सशक्त व्यक्तित्व वाले संतों ने भी तत्कालीन समाज की पीड़ा को समझा और उसका व्यवहारिक समाधान निकालकर जन भाषा में जनता के सामने रखा। समाज के इस दुःसाहस ने उन्हे तानकर खड़े होने की शक्ति प्रदान की। उन्हे अपनी शक्ति, सामथ्र्य और मान्यताओं पर जो विशवास था, वह और भी दृढ़ हो गया। फक्कड़मस्ती में कही गई बातों ने समाज को अनायास ही प्रभावित किया।
संत-भावना, जो अब तक व्यक्ति के माध्यम से अभिव्यक्ति होती थी, अब अविछिन्न धारा के रूप में सामाजिक परम्परा ही बन गई। मध्य युगीन भरतीय समाज को इन संतो की यह सबसे बड़ी देन है। समाज, धर्म और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है। ये तीनोें किसी न किसी रूप में एक दूसरे के सहायक हैं साथ ही यह भी निश्चित है कि एक भ्रष्ट होने पर शेष दो भी किसी न किसी रूप से भ्रष्ट और उद्देश्यहीन बन जाते हैं। तीनों का विकास ओर हा्रस एक दूसरे पर निर्भर है। समाज के पतित हो जाने पर धर्म और साहित्य स्वतः हीन भावनाओं से संयुक्त हो जाते हैं। जब साहित्य सक्रिय ओर सद्भावनाओं से सम्पन्न होता है, तो समाज और साहित्य स्वयं समुन्नत बन जाते है। तेरहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक के समाज, साहित्य ओर धर्म की यही दशा थी। उत्तर7पश्चिम से आने वाले आक्रमणकारियों ने भारतीय समाज और ध्र्म को इतना पद-दलित किया कि भारतीय जनता अपनी समस्त मौलिकता, स्वातंत्रय ओर प्रगतिशीलता को विस्मृत कर जीवन के दिनों को पूरा करते रहने में ही अपने जीवन की कुशलता समझती रही। भारतीय जनता मुसलामान विजेताओं की तलवारों से इतनी आतंकित रही कि ‘स्वधर्मांे निधनं श्रेयः को भूल गई थी और उनमें धार्मिक रूढ़िता तथा खोखलापन आ गया था। इसी धार्मिक रूढ़िग्रस्तता ने अनेक साधना पन्थों को पल्लवित होने का अवसर दिया, दूसरी ओर दर्शन और चिन्तन के क्षेत्र में भक्ति सुलभ जन आंदोलन भी उठ खड़े हुए जो धार्मिक चेतना को सबसे अधिक प्रभावित कर सके। इस्लाम के अन्तर्गत सूफियों की धार्मिक भावना और व्यापक भ्रातृत्व और रहस्यात्मकता यद्यपि इस देश के लिए कोई नई बात नहीं थी तथापि वही एक दृष्टिकोण था जिसके फलस्वरूप धार्मिक सहिष्णुता का पोषण किया हो, ऐसी बात नहीं है किन्तु फिर भी जिस सामाजिक और राजनैतिक आक्रोश की बात भारतीय समाज में बद्धमूल हो रही थी, उसे शिथिल करने में यह नवीन धर्म पर्याप्त सक्रिय रहा।
बौद्ध धर्म की भस्म पर मध्य युगीन भक्ति-साधना का स्तूप निर्मित हुआ। सातवीं और आठवीं शताब्दियों में पौराणिक धर्म का पुनर्गठन हो रहा था और उस समय बौद्ध विचारधारा के साथ शैव, शाक्त, पांचरात्र तथा भागवत मत पल रहे थे। बौद्ध धर्म से महायान का विकास हुआ। महायान विरति और विवेक संबंधी तत्वों को शैवों ने और भक्ति सम्बन्धी तत्वों को वैष्णवों ने ग्रहण कर लिया। बौद्ध धर्म गिरते-गिरते अपनी विरासत को सन्त साधना के रूप में छोड़ गया। पता भी नही चला कि इतना विराट बौद्ध-संघ कहां लुप्त हो गया। वस्तुतः यह मध्ययुगीन भक्ति-साधना में अन्तर्मुक्त हो गया। बुद्ध विष्णु के रूप में समविष्ट हो गये। बौद्धों का सहजयान बैष्णवों के सहजिया सम्प्रदाय में परिवर्तित हो गया। यह वैष्णव धर्म की उदारता ओर प्रगतिशीलता का द्योतक है। मध्य कालन संत साधना, बौद्ध साधना की ठीक उत्तराधिकारणी ठहरती है। बुद्ध के पश्चात् मौलिक और स्वतंत्र चिंतक कबीर हुए। भगवान बुद्ध बार-बार कहते थे कि वे उसी को कहते हैं जिसका उन्होने स्वयं साक्षात्कार कर लिया है। जो जो मैने स्वयं देखा है उसे कहता हूँ। यं मया सामेद्यिटठ वदामि’’ बुद्ध के ही स्वरों में स्वर मिलते हुए कबीर ने कहा है कि- ‘मैं कहता हूँ आँखिन देखी’ या अपितु आयु विचारिये तब केता होय आनन्द रे। यह उनके व्यवहारिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
बौद्ध और जैन चिंतन के व्यवहारिक सुधार जब स्वयं ही लोक विरोधी हो गये, लगभग उसी समय स्वामी शंकराचार्य के तथा अन्य अनेक आचार्यों के प्रयत्न एवं लोक जीवन की स्वाभाविक भंग के फलस्वरूप भारतीय धार्मिक चेतना में क्रांतिकारी परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं।
दर्शन के क्षेत्र में जिस बौद्ध शून्यवाद के नैरात्मय भारतीय जाति को निष्क्रिय और परांगमुख बना दिया था, स्वामी शंकराचार्य ने उसी शून्यवाद में आत्म तत्व का अन्वेषण कर लोगों के मन पर बौद्ध धर्म के दार्शनिक युक्ति जाल की आस्था को मिटा दिया। यह मत मूलतः तर्क प्रधान है। साधारण जन-समूह धर्म और दर्शन को तर्क अपेक्षा भक्ति के माध्यम से
समझने के लिये व्याकुल हो उठा। विभिन्न वैष्वण आंदोलनों का उदृष्ट शंकराचार्य के मत का परिष्कार था अथवा उनके मत के विरोध में अपने मत का संगठन था। वैष्वण आचार्यांे के मतों के साथ ही जिस आडम्बर भक्ति का स्रोत दक्षिण से उठकर सम्पूर्ण देश में व्याप्त हो गया था। निर्गुण संत काव्य के आविर्भाव की परिस्थितियों में उसका महत्वपूर्ण स्थान है। दक्षिण में जिस समय आडम्बर भक्ति चरम बिन्दु थी, उत्तर में योगमार्गी कायिक साधना की दुन्दुभी बज रही थी। मध्य युगीन ध्र्म साधना की चर्चा करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- ‘‘भक्ति साहित्य के पढ़ने वाले पाठकों को जो बात सबसे पहले आकृष्ट करती है, विशेषकर निर्गुण भक्ति के अध्येता को वह यह कि उन दिनों उत्तर में हठयोगियों और दक्षिण के भक्तों में मौलिक अन्तर था। एक को अपने ज्ञान का गर्व था, दूसरे को अपने अज्ञान का भरोसा, एक के लिए पिण्ड ही ब्राहा्रण था, दूसरे के लिए ब्राहा्रण ही पिण्ड। एक का भरोसा अपने पर था, दूसरे का राम पर। एक प्रेम को दुर्बल समझता था, दूसरा ज्ञान को कठोर। एक योगी था दूसरा भक्ति, इन दो धाराओं का अद्भुत मिलन की निर्गुण धारा का वह साहित्य है जिसमें एक तरफ कभी न झुकने वाला अक्खड़पन है और दूसरी तरफ घर फंूक मस्ती वाला फक्कड़पन। रैदास ने उन परम्पराओं का विरोध किया जो समाज की प्रगति को अवरूद्ध किये हुए थी। रैदास से पहले संतो ने भी रूढ़ियों को विरूद्ध आवाज उठाई थी, पर वे किसी सीमा तक सामाजिक जड़ता को प्रभावित नहीं कर सके।
रैदास को तो इन सामाजिक जड़ता के कारण स्वयं भी बहुत दुख झेलने पड़े थे इसीलिए उनमें विद्रोही स्वर अधिक तीव्र और प्रभावी थां निरंतर त्रास और विदेशी शासकों द्वारा पददलित होने के कारण पैदा हुई हीनभावना से मुक्ति दिलाने की भी संतों ने पर्याप्त चेष्टा की।
मध्य युग में जिस धार्मिक प्रवृत्ति का विकास हुआ था अब उसका संस्कृत स्वरूप निखर आया। योग की काया साधना का स्थान भगवान की भक्ति ने ले लिया। यही कारण है कि धर्मों जातियों तथा सम्प्रदायों की श्रृंखला को तोड़ते हुए निर्गुणोपासक संतों की परम्परा का आविर्भाव हुआ।
संतों ने स्पष्ट देखा कि तत्कालीन देश धार्मिक और सामाजिक स्थितियां विकृत हैं मानव मानवीयता त्याग कर अमानवीय व्यवहारों में संयुक्त है। मानव जीवन का कोई मूल नही है। ‘‘राजनीति के झीने आवरण में मानव आमल परिवर्तित होकर दानव हो गया। मानव समाज द्वैत के संकल्प-विकल्प में पड़ा हुआ बाहा्रचारों में संलग्न है। यह भक्ति के पथ से विचलित होकर माया-काया के मोह में पड़ा था। मनुष्य रंग-रास, वैभव-कनक, कामिनी के लोभ में पड़कर पथभ्रष्ट हो गया था। अबोध बालक बालिका के समान गुड़िया गुड्डों से मन बहलाने के सदृश तत्कालीन मानव समाज देवता, द्विज, भुइयां, भवानी की उपासना में अपने कष्टों का परिष्कार करने की योजना बना रहा था। वास्तव में सत् भक्ति या सत् धर्म उस समय विलीन हो गया था। जीवन असत् तम ओर कृतिमता से आवृत्त हो गया था। तीर्थ, व्रत, जप-तप आदि क्रियाओं से भटकता हुआ मानव-मानवता और अद्वैत ब्रहा्रा को भूल गया था। इस कसमकस पंकिल परिस्थिति में कबीर पंकज के समान उत्पन्न होकर अपनी दिव्य और अमर वाणी से सहज धार्मिक स्थिति को प्रतिष्ठित कर मानवों में मानवीयता की सुरभि भर दी। उन्होने एक ऐसे मानवता धर्म का उद्घटन किया जो देश, काल, जाति, धर्म, वर्ण आदि किसी के घेरे में घिर नहीं सकता। उन्होने उसमें मानव जीवन के विकासशील तत्वों को ही धर्म स्थान दिया और उन्हे तर्क एवं बुद्धि का आधार प्रदान कर उस पर खड़े आडम्बर एवं अंधविश्वास के आवरण को भस्म कर दिया ऐसा करने उन्हे युगीन परिस्थितियों से ही अतुल प्रेरणा मिली।
1. ‘‘यह संसार सकल जग मैला, नाम गहे तेहिं संचा। कहै कबीर भक्ति मत छोड़े गिरत परत चदु ऊँचा।।
सन्तबानी संग्रह, भ.2,पृ.20
2. ‘‘चलत निहारत छोह, नमक के बोलत बाती। पोवा चन्दन लाई के, पाहिरे बसन रंगाय।’’
सन्तबानी संग्रह, भ.2,पृ.22
3. ‘‘गालियाँ-गलियाँ झाँकी मारै, पर तिरिया लख मुसकाय।। गुड़िया-गुड़वा रूप सुपलिया, तजिदे बुधि तरि कैया खेलन की। देवता फिर भुइया भवानी, यह मरग चैरासी चलन की।।’’
सन्तबानी संग्रह, भ.2,पृ.22
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Received on 27.08.2018 Modified on 09.09.2018
Accepted on 19.09.2018 © A&V Publications All right reserved
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